जैविक भिंडी उत्पादन की तकनीकें
उपयुक्त भूमि
अच्छी जल निकास वाली हल्की दोमट भूमि भिंडी की जैविक खेती के लिए उपयुक्त है, जिसमें कार्बनिक तत्व पर्याप्त मात्रा में और पी एच मान 6 से 6.8 होना चाहिए| पी एच मान 6 से कम होने पर मिट्टी के सुधार के लिए चूना का प्रयोग करना चाहिए| खेती के पहले मिट्टी की जॉच करा लेना फायदेमंद रहता है|
किस्मों का चयन
भिंडी की जैविक खेती के लिए किस्मों का चयन किसानों को अपने क्षेत्र और परिस्थितियों के अनुसार करना चाहिए| जहां तक संभव हो अपने क्षेत्र की प्रचलित किस्म उगाये और जैविक प्रमाणित बीज का इस्तेमाल करें| भिंडी की कुछ प्रमुख उन्नत तथा संकर किस्में इस प्रकार है, जैसे-
उन्नत किस्में- हिसार उन्नत, वी आर ओ- 6, पूसा ए- 4, परभनी क्रांति, पंजाब- 7, अर्का अनामिका, वर्षा उपहार, अर्का अभय, एच बी एच और पंजाब- 8 प्रमुख है|
संकर किस्में- सोनल, सारिका, वर्षा, विजय, नाथ शोभा, सनग्रो- 35 आदि प्रमुख है और उन्नत किस्मों की तुलना में संकर किस्मों से पैदावार ज्यादा मिलती है|
बीज की मात्रा और बीजोपचार
उन्नत- भिंडी की जैविक खेती हेतु ग्रीष्मकालीन फसल के लिए 15 से 20 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर और वर्षाकालीन फसल के लिए 10 से 15 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर बीज की आवश्यकता होती है|
संकर- संकर किस्मों के लिए 5 से 7 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर बीज लेना चाहिए|
बीजोपचार
बीज को बीजामृत या ट्राईकोडर्मा से उपचारित कर लगाना चाहिए|
खेत की तैयारी और बुआई
- बंसतकालीन फसल की बुआई फरवरी से मार्च और वर्षाकालीन फसल मई से सितम्बर तक की जाती है|
- खरीफ में पीला सिरा मोजेक रोग लगता है, जिससे फसल को क्षति होती है| बुआई अगेती या पछेती करने से रोग का प्रकोप कम होता है|
- भिंडी की जैविक खेती से अच्छी पैदावार के लिए ग्रीष्मकालीन बुआई के लिए बीज को रातभर फुलाते है और फूले हुए बीज को पोटली में रखकर ताजे गोबर के ढेर में दबाकर 2 से 3 दिन रखकर अंकुरण करा लें तथा अंकुरित बीज की बुआई करें| खेत में बुआई के समय नमी का होना आवश्यक है|
- बंसतकालीन भिंडी की जैविक फसल के लिए पंक्ति से पंक्ति की दूरी 45 सेंटीमीटर और पौधे से पौधे की दूरी 20 सेंटीमीटर रखें|
- वर्षाकालीन भिंडी की जैविक फसल के लिए कतार से कतार की दूरी 50 सेंटीमीटर एवं पौधे से पौधे की दूरी 25 सेंटीमीटर रखें|
जैविक खाद
- भिंडी की जैविक खेती से उत्तम पैदावार के लिए खेत की अच्छी तरह जुताई कर क्यारियाँ बना लें|
- अन्तिम जुताई में 150 से 200 किंवटल गोबर की सड़ी खाद या 50 किंवटल प्रति हेक्टेयर केंचुआ खाद दें और साथ ही 5 क्विटल नीम खल्ली (पिसा हुआ) मिट्टी में अच्छी तरह मिला दें|
- बुआई के पहले मिट्टी में बायोडायनमिक खाद (बी डी 500 व बी डी 501) देना भी लाभदायक है|
- सिचाई और निराई-गुड़ाई ग्रीष्मकालीन भिंडी की जैविक खेती में 5 से 6 दिनों पर और वर्षाकालीन फसल में आवश्यकतानुसार सिंचाई करें|
- भिंडी की जैविक खेती में ड्रीप विधि से सिंचाई करना लाभकारी पाया गया है, जिस पर सरकारों द्वारा अनुदान भी दिया जा रहा है|
- भिंडी की जैविक खेती में बुआई के तुरंत बाद खरपतवार निकल आते है, इसलिए अंकुरण के 8 से 10 दिन बाद से निराई-गुड़ाई शुरू कर दें|
- ग्रीष्मकालीन फसल में 2 बार और खरीफ फसल में 3 बार निराई-गुड़ाई की आवश्यकता होती है| अन्तिम निराई-गुड़ाई के बाद पौधों के जड़ों के पास मिट्टी अवश्य चढ़ा दें|
भिंडी के प्रमुख कीट एवं प्रबंधन
प्ररोह एवं फल छेदक- इस कीट की सुण्डी मुलायम टहनियों के शीर्ष भाग, कलियों, फूलों एवं अविकसित फलों में छेद कर अन्दर घुस जाती है, जिससे प्रभावित फल खाने योग्य नहीं रह जाते| शीर्श भाग सूख कर नीचे झुक जाता है और फल टेढ़े हो जाते हैं| ग्रसित पौधों में कलियां एवं फूल भी नीचे गिर जाते हैं और बढ़वार बुरी तरह प्रभावित हो जाती है|
जैसिड या हरा फुदका- यह हरे रंग का छोटा कीट होता है| इस कीट के शिशु और वयस्क दोनों ही भिंडी की पत्तियों की निचली सतह पर रहकर रस चूसते हैं| पत्तियां पीली पड़ने लगती हैं एवं मुड़कर कप के आकार की हो जाती हैं तथा पौधा छोटा रह जाता है| इसके मल मूत्र से तने पर काली फफूद लग जाती है|
सफेद मक्खी- यह अत्यन्त छोटे आकार का कीट होता है| शिशु एवं प्रौढ़ दोनों ही भिंडी की मुलायम पत्तियों और शाखाओं से रस चूसते हैं| सफेद दाग जैसे धब्बे बनते हैं, धीरे-धीरे पीले रंग उतक बन जाते हैं और ज्यादा प्रकोप होने पर पत्तियां छोटी-छोटी अवस्था में गिर जाती हैं| इस कीट के प्रकोप से तने पर फफूद पैदा हो जाती है| यह पीला शिरा मोजेक पैदा करती है|
प्रबंधन
- जैविक खेती में भिन्डी में कीट प्रबंधन हेतु भभूत अमृत पानी से बीज/पोध उपचार + देशी अर्क (10 किग्रा नीम पत्ती + 5 किग्रा निम्बोली + 2 किग्रा आक की पत्ती + 2 किग्रा धतूरा पत्ती + 50 लीटर पानी को गर्म करके छाने एवं 200 लीटर पानी में मिला कर 1 एकड के लिए) का बुवाई के 30 एव 45 दिन के बाद पर्णीय छिडकाव करें.
- भिन्डी में रस चूसने वाले कीटों के नियंत्रण हेतु 20 प्रतिसत गोबर की सलर्री और गोमूत्र (1:1) को पानी में घोल बना कर कीट दिखाई देने पर एवं उसके 10 दिन बाद छिडकाव करें
भिंडी में रोग प्रबंधन
पौध आर्द्रगलन- ठण्डे व वर्षा वाले मौसम, बादल, अधिक नमी एवं नम व कठोर मिट्टी में यह समस्या अधिक आती है| इस रोग से ग्रसित पौधे में जमीन के सतह से आक्रमण होता है| जिसे भिंडी के ग्रसित पौध उगने से पहले या बाद में मर जाते हैं|
उकठा रोग– इस रोग के लक्षण भिंडी के पौधे की किसी भी अवस्था में दिखाई पड़ सकते हैं| मई से जून में बोई गई फसल पर रोग का प्रकोप अधिक होता है| पुराने पौधों की अपेक्षा नये पौधे अधिक प्रभावित होते हैं| पत्तियां पीली पड़ कर मुड़ने लगती हैं, वृद्धि रुक जाती है तथा पौधा मरने लगता है| रोगग्रस्त पौधे दोपहर में मुरझाए एवं अगले दिन स्वस्थ दिखाई देते हैं| तने तथा भूमि की सतह से 2 से 3 सेंटीमीटर ऊपर तक तने का भीतरी भाग भूरा हो जाता है|
पीला सिरा मोजेक- इस रोग के मुख्य लक्षण भिंडी की पत्तियों पर दिखाई देते हैं| वायरस के कारण भिंडी की पत्तियों में शिराएं मोटी होने के साथ ही साथ हरिमाहीन हो जाती हैं| पत्ती पर चमकीली और पीली शिराओं का जाल अधिक स्पष्ट हो जाता है| जब संक्रमण व्यापक होता है, तो नई पत्तियाँ पीली पड़कर छोटी हो जाती हैं और सम्पूर्ण पौधा बौना रह जाता है| रोग के प्रभाव से पौधों में पुष्पन सीमित हो जाता है एवं इन पर बने फल संख्या में कम, छोटे, पीले, हरे रंग के और विकृत हो जाते हैं|
प्रबंधन
- सभी प्रकार के खरपतवार परपोषियों को जहां तक सम्भव हो उखाड़ कर नष्ट कर दें|
- ट्राइकोडर्मा विरिडी 2 ग्राम प्रति100 ग्राम बीज की दर से उपचारित करें|
- रोग रोधी किस्में जैसे- परभनी क्रान्ति, पूसा सावनी, वी आर ओ- 5,6 तथा अर्का अनामिका का चुनाव करें|
- भिंडी की खेती में रोग के लक्षण दिखाई देते ही पौधों को उखाड़ कर जला दें|
- भिंडी की खेती में ब्यूवेरिया बैसियाना का छिड़काव 4 ग्राम प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर करें|
- प्रभावित भूमि को प्रत्येक वर्ष बदल देना चाहिए एवं भूमि का सौरीकरण करना चाहिये|
- ग्रीष्म काल में खेत की गहरी जुताई करके अच्छी सड़ी गोबर की खाद और नीम की खली 400-500किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से प्रयोग करें|